वह शायद अपने समय से आगे थे

सोवियत संघ के अंतिम नेता मिखाइल गोर्बाचेव का निधन विश्व इतिहास के एक बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली जीवन का पटाक्षेप है। रूस पर पडे़ लोहे के परदे को हटाने और शीत युद्ध का अंत करने जैसी विरासत वह छोड़ गए हैं। वामपंथी दिग्गज व्लादिमीर लेनिन और जोसेफ स्टालिन द्वारा निर्मित एक महाशक्तिशाली देश के विघटन का नेतृत्व करने के लिए हुए तिरस्कार के अलावा गोर्बाचेव कई निहितार्थों के साथ जटिल विरासत छोड़ गए हैं। 

गोर्बाचेव की जो छवि बार-बार सामने आती है, वह एक खुशनुमा चेहरे वाले सज्जन व्यक्ति की छवि है, जो 1985 में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने थे। एक भारी-भरकम व ठहराव के शिकार सोवियत संघ में सुधार के लिए उन्होंने संघर्ष की शुरुआत की थी। ‘पेरेस्रोइका’  (पुनर्गठन) और ‘ग्लासनोस्त’ (खुलेपन) पर उनके हस्ताक्षर अभियान ने दुनिया को मोहित कर दिया था, क्योंकि उन्होंने बीमार कम्युनिस्ट व्यवस्था को पुनर्जीवित करने और इसे कम अधिनायकवादी बनाने का वादा किया था। एक मंजे हुए कम्युनिस्ट के रूप में गोर्बाचेव ने कभी किसी ऐसे धमाके को अंजाम देने का इरादा नहीं जताया था, जो उस व्यवस्था को ही मटियामेट कर दे, जो स्वयं उन्हें सत्ता के शिखर पर ले लाई थी। हालांकि, सोवियत साम्यवाद को बचाने के लिए उनकी सुधार की प्रक्रिया बहुत देर से शुरू हुई, जिसके मूल सिद्धांत धोखे, भय और व्यक्तियों व निगमों के लिए प्रोत्साहन के अभाव पर आधारित थे।

सोवियत अर्थव्यवस्था और सोवियत राजनीति को एक साथ उदार बनाने के गोर्बाचेव के तरीकों ने एक ऐसी बेकाबू लहर को जन्म दिया, जिसने 1991 में पूरे घर को ही ढहा दिया। गोर्बाचेव के संशय भरे नेतृत्व में सोवियत साम्यवाद के पतन का चीनी वामपंथियों ने बहुत गहराई से अध्ययन किया है। चीन अपने वाम कार्यकर्ताओं को गोर्बाचेव व सोवियत संघ की गलतियों से सीखने व बचने के लिए प्रशिक्षित करता है। आज अगर चीन के वामपंथी सत्ता में डटे हुए हैं और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जिस प्रकार से असाधारण शक्तियां धारण कर रखी हैं, उसमें सोवियत संघ से मिले सबक का भी प्रभाव है। वहां पर यह धारणा है कि पश्चिमी मूल्यों ने गोर्बाचेव के सुधार प्रयासों की नाकामी में प्रमुख भूमिका निभाई है। 


रूस में भी गोर्बाचेव की निंदा हुई कि उन्होंने अपने देश की महाशक्ति वाली स्थिति को बर्बाद कर दिया और दुनिया की बागडोर विस्तारवादी पश्चिम के हाथों में थमा दी। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने तो सोवियत संघ के अंत को 20वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक तबाही करार दिया था। पुतिन का मानना है कि गोर्बाचेव ने रूसी समाज में उदार संभावनाओं के लिए द्वार खोलकर और लोकतंत्र व स्वतंत्र अभिव्यक्ति के पश्चिमी विचारों को फैलने की जगह देकर मौलिक रूप से गलती की थी। यह कैंसर की तरह था, जिसने पूरी सोवियत इमारत को तहस-नहस कर दिया।

तथ्य यह है कि गोर्बाचेव ने सोवियत के साये तले के गणराज्यों में मास्को के खिलाफ हुए विद्रोह को कुचलने के लिए सैन्य बल का कारगर इस्तेमाल नहीं किया था। इसके बजाय वह अपने अमेरिकी व पश्चिमी, यूरोपीय समकक्षों के साथ मित्रता निभाते रहे और अति-राष्ट्रवादी रूसियों के पक्ष में कुछ भी नहीं किया। 

आज गोर्बाचेव के सिनात्रा सिद्धांत के चलते हुए देश के अपमान का बदला लेना और सोवियत साम्राज्य को फिर साकार करना, जाहिर तौर पर पुतिन के लिए मुख्य प्रेरणा बने हुए हैं। गोर्बाचेव को फ्रैंक सिनात्रा के मशहूर गीत माई वे से सिनात्रा सिद्धांत की प्राप्ति हुई थी। इस सिद्धांत के तहत गोर्बाचेव मानते थे कि पूर्वी यूरोप के देशों को अपनी तकदीर का फैसला करने की इजाजत होनी चाहिए। पश्चिम के साथ सुलह और समायोजन की शानदार परियोजना गोर्बाचेव ने शुरू की थी, ताकि रूस व्यावहारिक रूप से अपने विरोधियों के साथ मिल-जुलकर रह सके। आज पटकथा बदल गई है, जहां एक ओर, यूक्रेन पर रूस का आक्रमण है, तो दूसरी ओर, नाटो की भी विस्तार योजना है, जिसमें शायद फिनलैंड और स्वीडन भी शामिल हो जाएंगे। 

आज कई देश द्वितीय शीत युद्ध को बढ़ावा देने में लगे हैं। एक तरफ, पुतिन का कट्टर सत्तावादी राज्य मॉडल है, तो दूसरी ओर, अमेरिका व यूरोप को उम्मीद है कि रूस को एक सामान्य उदार पश्चिमी देश बन जाना चाहिए। गोर्बाचेव ने जो चिनगारी सुलगाई थी, उसे पुतिन ने बुझा दिया। गोर्बाचेव ने जुलाई 1989 में पहली बार आंशिक रूप से मुक्त राष्ट्रव्यापी चुनाव कराए थे, पर बाद में पुतिन के नेतृत्व में मास्को ने बेरहमी से उस व्यवस्था को निष्क्रिय कर दिया। गोर्बाचेव के जीते जी पुतिन ने उनके जीवन भर के कार्यों पर पानी फेर दिया था। क्या गोर्बाचेव समय के साथ असंगत होते गए? क्या उन्होंने दाव लगाया और सब कुछ हार गए? क्या वह एक ऐसे दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने एक ऐसे रूस का ख्वाब बुनने की हिम्मत की थी, जो अपने निरंकुश इतिहास से खुद को आजाद कर लेगा? 


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तथ्य यह है कि 1996 में अपने उत्तराधिकारी बोरिस येल्तसिन के खिलाफ जब गोर्बाचेव राष्ट्रपति चुनाव लड़े, तो उन्हेें एक प्रतिशत से भी कम वोट हासिल हुए थे, जबकि इधर पुतिन की लोकप्रियता लगातार कायम है। इससे पता चलता है कि गोर्बाचेव रूसी मानस के साथ तालमेल नहीं रखते थे। वर्ष 2017 में उन्होंने दावा किया था कि रूस राजनीतिक प्रतिस्पद्र्धा के लिए तैयार है। वैसे एक असली बहुदलीय व्यवस्था, निष्पक्ष व नियमित चुनाव जैसी बातें पश्चिमी उदारवादियों के लिए सुरीली हो सकती हैं, पर रूस की घरेलू राजनीति में इनका ज्यादा महत्व नहीं रह गया है। एक सांविधानिक व लोकतांत्रिक नियंत्रणों से लैस यूरोपीय देश में बदलने की रूस की संभावनाएं धूमिल ही दिखती हैं। फिर भी, शहरी युवा रूसियों में उदार जमात भी है। रूस में युद्ध व साम्राज्यवाद-विरोधी भावना भी है, मतलब गोर्बाचेव के गुण पूरी तरह से गायब नहीं हुए हैं। 

रूस में उथल-पुथल व क्रांतियों का लंबा इतिहास रहा है। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि गोर्बाचेव की इस दुनिया से विदाई के बाद शायद कभी भविष्य मे उनकी विरासत पुनर्जीवित हो जाए। एक दिन ऐसा आ सकता है, जब रूस और दुनिया कहेगी, वह अपने समय से बहुत आगे थे। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य -  हिन्दुस्तान।

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