नए भारत में कितने सुरक्षित हैं भारतीय

Amitesh Pandeyक्रिस्टोफर क्लैरी, राजनीति विज्ञानी


साल 2019 की 14 फरवरी को एक आत्मघाती हमलावर ने कश्मीर के पुलवामा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 40 जवानों की हत्या कर दी थी। इसके कुछ दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र की एक रैली में कहा कि हमले में मारे गए लोगों के लिए ‘निकले आंसू की हर एक बूंद’ का ‘बदला’ लिया जाएगा। उन्होंने दावा किया, ‘यह नया भारत है, जिसके पास नए तरीके और नई नीतियां हैं, और दुनिया इसका अनुभव करेगी। हमारे सैनिकों को निशाना बनाने वाले या उनको बम और बंदूक मुहैया कराने वालों को कतई बख्शा नहीं जाएगा। हम उनको चैन की नींद नहीं सोने देंगे।’ और, उसी महीने के अंत में मोदी ने भारतीय वायु सेना को सीमा पार करके खैबर पख्तूनख्वा के बालाकोट में हमले करने का निर्देश दिया, जहां आतंकियों के ट्रेनिंग सेंटर चलने का अंदेशा था। एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र का दूसरे देश की भौगोलिक सीमा में प्रवेश करके एयरस्ट्राइक करने का यह पहला मौका था।


कई विश्लेषकों के लिए राष्ट्रवाद का यह उभार और प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन (कथित बालाकोट हमला) 2019 के आम चुनाव में भाजपा की शानदार जीत का मुख्य आधार था। अगर यह सच है, तो इसका मतलब यह होगा कि रोटी, कपड़ा और मकान पर केंद्रित राजनीति से कभी प्रभावित होने वाले भारतीय अब इन सबसे ऊपर उठ गए हैं और ऐसी राजनीति के आकांक्षी हो चले हैं, जिसमें विदेश नीति घरेलू सियासी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। फिर भी, हम बहुत कम जानते हैं कि आम भारतीय विदेश नीति को लेकर क्या सोच या धारणा रखता है।


इसको कहीं बेहतर ढंग से समझने के लिए हमने इस साल अप्रैल-मई में 7,052 भारतीयों के बीच सर्वेक्षण किया। ‘सेंटर फॉर वोटिंग ओपिनियन ऐंड ट्रेंड्स इन इलेक्शन रिसर्च’ (सीवोटर) द्वारा किया गया यह सर्वे 28 राज्यों और छह केंद्र शासित क्षेत्रों में 12 अलग-अलग भाषाओं में किया गया। हमने पाया कि भारत अत्यधिक राष्ट्रवादी समाज है, क्योंकि 90 फीसदी लोगों ने मजबूती से या कुछ हद तक सहमति जताई कि भारत अन्य कई देशों की तुलना में बेहतर मुल्क है।  हमारे ताजा सर्वेक्षण में भारतीय उत्तरदाता उन भारतीयों की तुलना में कुछ अधिक राष्ट्रवादी साबित हुए हैं, जिन्होंने बरसों पहले के ऐसे ही अंतरराष्ट्रीय सामाजिक सर्वेक्षण कार्यक्रम में भाग लिया था। इसके अलावा, सर्वेक्षण में 71 फीसदी लोगों ने कुछ हद तक या मजबूती से प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन किया, जो संकेत करता है कि वह क्यों दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक हैं? प्रखर राष्ट्रवाद और प्रधानमंत्री का समर्थन सत्तारूढ़ भाजपा में मनमाफिक विदेश नीति तैयार करने का विश्वास पैदा करता है।

हमने अपने सर्वे में व्यापक तौर पर मुस्लिम-विरोधी भावना भी देखी। सर्वेक्षण में शामिल गैर-मुस्लिम लोगों में से 60 फीसदी से थोड़े कम उत्तरदाताओं ने कहा कि उनको मुस्लिम पड़ोसी से ऐतराज नहीं है, जबकि गैर-मुस्लिम लोगों की बड़ी संख्या (78 फीसदी) यह मानती दिखी कि भारत में मुस्लिम आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है। हमारे सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि भाजपा सरकार में मुसलमानों के प्रति लोकप्रिय रवैया मुस्लिम-विरोधी आवेग को रोकने के बजाय और बढ़ा सकता है। इस तरह का ज्वार नई दिल्ली और उसके नजदीकी कूटनीतिक साझीदारों (जैसे बांग्लादेश) के साथ-साथ पश्चिम एशिया सहित हिंद महासागर क्षेत्र में तनाव पैदा कर सकता है।


हालांकि, मुस्लिम-विरोधी भावना और बहुत अलग तरह के इतिहास के बावजूद, पाकिस्तान और चीन के प्रति भारतीयों में बहुत ज्यादा अविश्वास है। 67 फीसदी लोगों ने पाकिस्तान के प्रति अपनी गहरी नापसंदगी जाहिर की, जबकि चीन को हद से अधिक नापसंद करने वालों का प्रतिशत 65 है। जब हमने पूछा कि भारत क्षेत्रीय विरोधियों के साथ संघर्ष में कैसा प्रदर्शन कर सकता है, तो 90 फीसदी लोगों ने कहा कि युद्ध की स्थिति में भारत संभवत: या निश्चय ही पाकिस्तान को हरा देगा, जबकि ऐसी ही नौबत में चीन को हराने के सवाल पर हामी भरने वालों का प्रतिशत 72 रहा।


नीति-निर्माताओं और शिक्षाविदों में इस बात पर लंबे समय से बहस होती रही है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर भारतीय क्या सोचते हैं? हमने अपने सर्वेक्षण में पाया कि ज्यादातर भारतीयों को यह भरोसा था कि अगर चीन या पाकिस्तान के साथ भारत की जंग होती है, तो अमेरिका नई दिल्ली की मदद करेगा। हालांकि, हमारे उत्तरदाताओं को यह लगा कि संघर्ष की स्थिति में भारत को बाहरी मदद मिलेगी, मगर काफी ज्यादा (68 फीसदी) लोगों ने यह भी माना कि भारत के पास विरोधियों की तुलना में अधिक परमाणु क्षमता होनी चाहिए। सिर्फ 13 प्रतिशत लोगों ने कहा कि भारत के पास दुश्मनों जितने परमाणु हथियार होने चाहिए, जबकि ‘नाममात्र’ या ‘शून्य’ परमाणु हथियार संपन्न भारत की वकालत करने वाले लोगों की संख्या उंगली पर गिनने लायक थी। 



ऐसी सोच व्यापक तौर पर भारत के अभिजात वर्ग और बाहरी पर्यवेक्षक जाहिर करते रहे हैं, पर हमारे सर्वे के नतीजे विश्लेषकों के लिए आश्चर्यजनक हो सकते हैं। दरअसल, कभी-कभी बताई गई प्राथमिकताएं मौजूदा भारतीय नीति के विपरीत होती हैं। मसलन, परमाणु हथियारों के मामले में ही यह दिखता है कि भारत के पास बेशक पाकिस्तान जितने परमाणु हथियार हो सकते हैं, पर चीन से तो निश्चय ही कम हैं। यह भारतीय नीति-निर्माताओं पर जन-आकांक्षा के अनुरूप काम करने का दबाव बना सकता है।

काफी लंबे समय से राजनीति विज्ञानी विकासशील देशों में राजनीतिक व्यवहार और दृष्टिकोण का अध्ययन करते समय अपना ध्यान यूरोपीय और अमेरिकी रुख पर लगाते रहे हैं। प्रोफेसर पॉल स्टैनिलैंड और विपिन नारंग कहते भी हैं, ‘हमें इस बारे में और अधिक सुबूत चाहिए कि अमेरिका और यूरोप के बाहर मतदाता विदेश नीति के बारे में क्या सोचते हैं।’ स्पष्ट है, एक प्रमुख ताकत और बड़ा लोकतंत्र होने के नाते आने वाले वर्षों में भारत इस तरह के शोध के बड़े हकदारों में एक है।

(साथ में समीर लालवानी, नीलोफर सिद्दीकी और नीलांजन सरकार)

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